पूस जाड़  थरथर तन काँपा

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नागमती वियोग खण्ड-


पूस जाड़  थरथर तन काँपा। सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा।।
बिरह बाढ़ि  भा दारुन सीऊ। कँपि कँपि मरौं लेहि हरि जीऊ।।
कंत  कहौं हौं  लागौं  हियरें। पंथ अपार  सूझ  नहिं  नियरें।।
सौर   सुपेती   आवै  जूड़ी। जानहुं   सेज   हिवंचल  बूड़ी।।
चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला।।
रैनि  अकेलि  साथ  बहि सखी। कैसें  जिऔं  बिछोही  पँखी।।
बिरह सचान  भँवै  तन  चाँड़ा। जीवत खाइ  मुएँ  नहिं छाँड़ा।।
     रकत ढरा माँसू गरा हाड़ भए सब संख।
     धनि सारस होइ ररि मुई आइ समेटहु पंख।।

पुस्तक | पद्मावत कवि | मलिक मुहम्मद जायसी भाषा | अवधी रचनाशैली | महाकाव्य छंद | दोहा-चौपाई