अधर धरत हरि कैं

पीछे

1.    अधर धरत हरि कैं, परत ओठ-डीठि-पट-जोति।
        हरित बाँस की बाँसुरी इंद्रधनुष-रंग होति।। 

 

2.    सोहत ओढ़ैं पीत पटु स्याम, सलौनैं गात।
        मनौ नीलमनि-सैल पर आतपु पर्यौ प्रभात।। 

 

3.    डिगत पानि डिगुलात गिरि लखि सब ब्रज बेहाल।
        कंपि किसोरी दरसि कै, खरैं लजाने लाल।। 

 

4.    गोपिनु सँग निसि सरद की रमत रसिकु रस-रास।
        लहाछेह अति गतिनु की सबनु लखे सब-पास।। 
 

पुस्तक | बिहारी सतसई कवि | बिहारीलाल भाषा | ब्रजभाषा रचनाशैली | मुक्तक छंद | दोहा