चिरजीवौ जोरी

पीछे

1.    प्रलय-करन बरषन लगे जुरि जलधर इकसाथ।
        सुरपति-गरबु हर्यौ हरषि गिरिधर गिरि धरि हाथ।। 

 

2.    अपनैं अपनैं मत लगे बादि मचावत सोरु।
        ज्यौं ज्यौं सबकौं सेइबौ एकै नंदकिसोरु।। 

 

3.    तौ, बलिये, भलियै बनी, नागर नंदकिसोर।
        जौ तुम नीकैं कै लख्यौ मो करनी की ओर।। 

 

4.    मनमोहन सौं मौहु करि, तूँ घनस्यामु निहारि।
        कुंजबिहारी सौं बिहरि, गिरधारी उर धारि।। 

 

5.    चिरजीवौ जोरी, जुरै क्यौं न सनेह गँभीर।
        को घटि; ए बृषभानुजा, वे हलधर के बीर।। 
 

पुस्तक | बिहारी सतसई कवि | बिहारीलाल भाषा | ब्रजभाषा रचनाशैली | मुक्तक छंद | दोहा