बरनौं माँग सीस उपराहीं

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नखशिख खण्ड-

बरनौं माँग सीस उपराहीं। सेंदुर अबहि चढ़ा तेहि नाहीं।।
बिनु सेंदुर अस जानहुं दिया। उजिअर पंथ रैनि मँह किया।।
कंचन रेख कसौटी कसी। जनु घन मँह दामिनि परगसी।।
सुरुज किरिन जस गगन बिसेखी। जमुना माँझ सरसुती देखी।।
खाँडे धार रुहिर जनु भरा। करवत लै बेनी पर धरा।।
तेहि पर पूरि धरे जौं मोंती। जमुना माँझ गाँग कै सोती।।
करवत तपा लेहि होइ चूरू। मकु सौ रुहिर लै देइ सेंदूरू।।
     कनक दुआदस बानि होइ चह सोहाग वह माँग।
     सेवा करहिं नखत औ तरई उअै गगन निसि गाँग।। 

पुस्तक | पद्मावत कवि | मलिक मुहम्मद जायसी भाषा | अवधी रचनाशैली | महाकाव्य छंद | दोहा-चौपाई