त्यौं त्यौं प्यासेई रहत ज्यौं ज्यौं पियत अघाइ

पीछे

1.    नेहु न, नैननु कौं कछू उपजी बड़ी बलाइ।
       नीर-भरे नितप्रति रहैं, तऊ न प्यास बुझाइ।। 

 

2.    त्यौं त्यौं प्यासेई रहत ज्यौं ज्यौं पियत अघाइ।
       सगुन सलोने रूप की जु न चख-तृषा बुझाइ।।

पुस्तक | बिहारी सतसई कवि | बिहारीलाल भाषा | ब्रजभाषा रचनाशैली | मुक्तक छंद | दोहा