ऊँचै चितै सराहियतु गिरह कबूतरु लेतु

पीछे

1.    ऊँचै चितै सराहियतु गिरह कबूतरु लेतु।
       झलकति दृग, मुलकित बदनु, तनु पुलकित किहिं हेतु।। 


2.    उनकौ हितु उनहीं बनै, कोऊ करौ अनेकु।
       फिरतु काकगोलकु भयौ दुहूँ देह ज्यौ एकु।। 


3.    करतु जातु जेती कटनि बढ़ि रस-सरिता-सोतु।
       आलबाल उर प्रेम-तरु तितौ तितौ दृढ़ होतु।। 


4.    चलतु धैरु घर घर, तऊ घरी न घर ठहराइ।
       समुझि उहीं घर कौं चलै, भूलि उहीं घर जाइ।। 


5.    मैं यह तोहीं मैं लखी भगति अपूरब, बाल।
      लहि प्रसाद-माला जु भौ तनु कदंब की माल।। 
 

पुस्तक | बिहारी सतसई कवि | बिहारीलाल भाषा | ब्रजभाषा रचनाशैली | मुक्तक छंद | दोहा