तपै लाग  अब  जेठ असाढ़ी

पीछे

नागमती वियोग खण्ड-


तपै लाग  अब  जेठ असाढ़ी। भै मोकहँ  यह  छाजनि गाढ़ी।।
तन  तिनुवर  भा  झूरौं खरी। मैं  बिरहा  आगरि  सिर  परी।।
साँठि नाहिं लगि बात को पूँछा। बिनु जिय भएउ मूँ तन छूँछा।।
बध नाहिं औ  कंध न कोई। बाक  न आव  कहौं  केहि रोई।।
ररि  दूबरि भई  टेक बिहूनी। थंभ नाहिं  उठि सकै  न थूनी।।
बरसहिं नैन चुअहिं घर माहाँ। तुम्ह बिन कंत न छाजन छाँहाँ।।
कोरे कहाँ  ठाठ नव साजा। तुम्ह बिन कंत  न छाजन छाजा।।
     अबहूँ दिस्टि मया करु छान्हिन तजु घर आउ।
     मंदिल  उजार होत है  नव कै  आनि बसाउ।। 

पुस्तक | पद्मावत कवि | मलिक मुहम्मद जायसी भाषा | अवधी रचनाशैली | महाकाव्य छंद | दोहा-चौपाई