संस्कृति का शेषनाग

पीछे

यहाँ पर समझने की बात है कि जिसे सारा देश ‘पूरी‘ कहता है उसे भोजपुरी लोग ‘पूड़ी‘ कहते हैं और उनकी ‘पूरी‘ है ‘दाल-पूरी‘। भाषा के हिसाब से भोजपुरी लोग ठीक ही कहते हैंः जिसे ‘पूरन‘ भरकर ‘पूरा‘ किया जाय वह है ‘पूरी‘ और पूरी में पूरन रहती है नमक-हल्दी-हींग आदि से सुवासित चने की दाल।................ ‘पूरन‘ अर्थात् ‘पूर्णम्‘। तन्त्रशास्त्र में ‘पूर्णम्‘ कहते हैं ‘अ‘ से ‘ह‘ तक चलने वाली 52 अक्षरों की वर्णमाला को। काशी वाले इसे ही ‘सिद्ध मातृका‘ कहते हैं। .......... ‘वर्णमालिनी‘ भगवती को कहते हैं। यह वर्णमाला अपने ‘अक्षर‘ रूप में निराकार निर्गुण भगवती का प्रतीक है। शब्द के भीतर बैठकर ही यह सगुण साकार रूप लेती है। अतः पूर्णम् भी निराकार पराशक्ति का प्रतीक है। अतः उसके ऊपर आटे का ‘कवच‘ चढ़ाया जाता है जो ‘माया कवच‘ है। अब इस कवच को धारण करके वह निराकार पराशक्ति रूप और स्वाद की विशिष्टता ग्रहण कर लेती है। ............... इतना ही नहीं, पूर्ण स्वाद के लिए तो कुछ और चाहिए। ‘तप‘ यानी आग तथा ‘स्नेह‘ (भक्ति) यानी घी या तेल। इसी से जलती कड़ाही में इसे घी या तेल में पक्व करके ‘पक्वान्न‘ रूप दे देते हैं।

पुस्तक | मराल लेखक | आ0 कुबेर नाथ राय भाषा | खड़ी बोली विधा | निबन्ध